एक एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब
एक-एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब
ख़ून-ए-जिगर, वदीअ़त-ए-मिज़गान-ए-यार[1] था
अब मैं हूँ और मातम-ए-यक-शहर-आरज़ू[2]
तोड़ा जो तूने आईना तिमसाल-दार[3] था
गलियों में मेरी नाश[4] को खींचे फिरो कि मैं
जां-दादा-ए-हवा-ए-सर-ए-रहगुज़ार[5] था
मौज-ए-सराब-ए-दश्त-ए-वफ़ा[6] का न पूछ हाल
हर ज़र्रा मिस्ल-ए-जौहर-ए-तेग़[7] आबदार[8] था
कम जानते थे हम भी ग़म-ए-इश्क़ को पर अब
देखा तो कम हुए पे ग़म-ए-रोज़गार[9] था
किस का जुनून-ए-दीद तमन्ना-शिकार था
आईना-ख़ाना वादी-ए-जौहर[10]-ग़ुबार था
किस का ख़याल आईना-ए-इन्तिज़ार था
हर बरग[11]-ए-गुल के परदे में दिल बे-क़रार था
जूं[12] ग़ुन्चा-ओ-गुल आफ़त-ए-फ़ाल-ए-नज़र[13] न पूछ
पैकां[14] से तेरे जलवा-ए-ज़ख़म आशकार[15] था
देखी वफ़ा-ए-फ़ुरसत-ए-रंज-ओ-निशात-ए-दहर[16]
ख़मियाज़ा यक दराज़ी-ए-उमर-ए-ख़ुमार[17] था
सुबह-ए-क़यामत एक दुम-ए-गुरग[18] थी असद
जिस दश्त[19] में वह शोख़-ए-दो-आ़लम[20] शिकार था