खतरा टल गया
पुष्पपुर और चन्दनपुर पड़ोसी राज्य थे। दोनों राज्यों के बीच चिरकाल से दोस्ती थी। एक बार पुष्पपुर के राजा जयकेतु ने चन्दनपुर के राजा सिंहकेतु को अपने राज्य का संदर्शन करने का निमंत्रण दिया। सिंहकेतु उनकी इच्छा को मान कर पुष्पपुर आ पहुँचे।
पुष्पपुर में सिंहकेतु का अपूर्व स्वागत किया गया और उनका आदरपूर्वक अतिथि-सत्कार किया गया। सिंहकेतु ने तीन दिन पुष्पपुर में बिताये। तीसरे दिन दोपहर के समय भोजन के बाद जयकेतु तथा सिंहकेतु ने शौक से शतरंज खेलना शुरू किया, पर सिंहकेतु बराबर हारते गये। इस पर उन्हें अपमान महसूस होने लगा। स्वभाव से ही सिंहकेतु घमण्डी थे। वे अपनी छोटी सी हार को भी सहन न कर सकने वाले विचित्र स्वभाव के थे। इस कारण सिंहकेतु उसी दिन अपने राज्य को लौट गये और एक हफ्ते के अन्दर ही भारी सेना के साथ पुष्पपुर पर हमला करके उसे अपने राज्य में मिला लिया। तब जाकर उनका क्रोध शांत हुआ।
पुष्पपुर तथा चन्दनपुर राज्यों के बीस कोस की दूरी पर कनकपुर नामक एक और राज्य था। उस पर राजा विजय वल्लभ शासन करते थे। उनकी इकलौती बेटी मणिवल्लभी अनुपम रूपवती थी। मणिवल्लभी जब विवाह योग्य हुई, तब राजा विजय वल्लभ ने अपनी पुत्री के स्वयंवर का इंतजाम किया।
राजाओं के पास निमंत्रण भेजने के लिए सूची तैयार होने लगी। उस वक्त विजय वल्लभ के सामने एक भारी समस्या पैदा हो गई। वह यह थी कि चन्दनपुर के राजा सिंहकेतु के पास निमंत्रण-पत्र भेजना है या नहीं? निमंत्रण भेजने पर सिंहकेतु स्वयंवर में भाग लेने के लिए ज़रूर आ जायेंगे। लेकिन अगर स्वयंवर के समय राजकुमारी सिंहकेतु को छोड़ किसी दूसरे राजकुमार को वर लेगी, तो वे इसे अपने लिए अपमान की बात समझ बैठेंगे और कोई न कोई उपद्रव खड़ा कर देंगे। यदि उनके पास निमंत्रण न भेजा जाय, तो वे यह सोचकर नाराज़ हो सकते हैं कि उनकी उपेक्षा की गई है। इस प्रकार राज्य के लिए खतरा पैदा हो सकता है।
राजा सोचने लगे कि इस उलझन को कैसे सुलझाया जाय। मंत्री ने भांप लिया कि राजा किसी चिंता के मारे परेशान हैं। राजा ने अपनी समस्या मंत्री के सामने रखी। मंत्री ने थोड़ी देर सोचकर कहा— "महाराज, आप इस समस्या को लेकर चिंता न करें, मैं इसे हल करने का कोई उपाय सोच लूँगा।"
इसके बाद सभी राजाओं के पास निमंत्रण-पत्र भेजे गये। स्वयंवर के दिन सभी राजाओं के साथ सिंहकेतु भी आ पहुँचे और वे दर्प (घमंड) के साथ उचित आसन पर विराजमान हो गये। वरमाला हाथ में लेकर राजकुमारी मणिवल्लभी सभा में पहुँची और उसने रत्नपुर के युवराज चन्द्रसेन के गले में माला पहना दी।
राजसभा हर्षध्वनि के साथ गूँज उठी। इसे देख सिंहकेतु का चेहरा तमतमाने लगा। हर्षध्वनि के बाद थोड़ी देर में सभा भवन में शांति छा गई। तब मंत्री ने उठकर निवेदन किया— "इस स्वयंवर में भाग लेकर कार्यक्रम को सफल बनाने के उपलक्ष्य में मैं अपने राज्य की तरफ से सभी राजाओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता हूँ! अक्सर स्वयंवर के समय गड़बड़ियाँ हुआ करती हैं क्योंकि निमंत्रण पाने वाले राजाओं की संख्या ज़्यादा होती है, मगर राजकुमारी किसी एक को ही वर सकती है; बाकी लोगों को निराश होना पड़ता है। आप लोगों से मेरी प्रार्थना है कि इसे आप लोग सहृदयता पूर्वक स्वीकार कर लें!"
मंत्री ने आगे कहा— "जब से स्वयंवर के इंतजाम शुरू हुए, तब से हमारे मन में यह डर बना रहा कि स्वयंवर के समय कोई न कोई बखेड़ा पैदा हो जाएगा। सिर्फ हमारे मन में ही नहीं, बल्कि हमारे मित्र देश चन्दनपुर के राजा सिंहकेतु के मन में भी यह शंका पैदा हुई। इसलिए ज़रूरत पड़ने पर हमारी मदद करने के लिए वे भारी सेना लेकर यहाँ पर पधारे हुए हैं! बस, यही बात है! लेकिन वे स्वयंवर में भाग लेने के लिए नहीं आये हैं। हमारे राज्य से चौगुने बड़े भूभाग के अधिपति को हमारे देश के साथ रिश्ता जोड़ने की कोई ज़रूरत नहीं है। पर न मालूम क्यों, उन्होंने हमें यह बात सूचित नहीं की, लेकिन भेदियों के द्वारा हमें यह समाचार पहले ही मिल गया है। हमारी प्रार्थना के बिना ही वे हमारी मदद करने के लिए पधारे हैं, इसीलिए हम अपने राज्य की तरफ से उनके प्रति विशेष रूप से कृतज्ञता प्रकट करते हैं!"
मंत्री की बात पूरी होने के पहले ही सभा में उपस्थित राजकुमारों ने सिंहकेतु के जयकार किये। सिंहकेतु को यह सब कुछ विचित्र सा लगा। यदि वे मंत्री की बातों को झूठी बतलाते, तो इसका मतलब होता कि राजकुमारी ने उनका तिरस्कार किया है और वे हार गए हैं। यदि वे चुप रह जायें तो कम से कम मंत्री द्वारा की गई यह झूठी तारीफ़ उन्हें मिलेगी और साथ ही उनका आत्म-सम्मान भी बचा रहेगा।
यों विचारकर सभासदों के जयकार सुनते हुए सिंहकेतु दर्प के साथ सिर हिलाने लगे। इसके बाद सिंहकेतु राजा विजयवल्लभ के द्वारा खूब अतिथि-सत्कार पाकर खुशी के साथ अपने राज्य को लौट गये। खतरा टलने की वजह से राजा विजय वल्लभ ने दिल खोलकर अपने मंत्री का अभिनंदन किया।