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जादू की पेटी

समतट देश के राजा साम्य की इकलौती पुत्री श्रावस्ती थी। एक दिन श्रावस्ती अपनी सहेलियों के साथ तृप्तिका नदी में स्नान कर रही थी। उस वक्त मालागढ़ का युवराज माल्य तथा अवंतिका नगर का युवराज अवंत अपने घोड़ों पर नदी के किनारे से आ निकले। श्रावस्ती अनुपम सुंदरी थी। उसके सौंदर्य पर दोनों युवराज मोहित हो उठे और उनके मन में श्रावस्ती के साथ विवाह करने की प्रबल इच्छा पैदा हुई। युवराजों ने श्रावस्ती की सखियों के द्वारा जान लिया कि वह युवती समतट देश की राजकुमारी है। यह घटना देख श्रावस्ती घबरा गई और तुरंत पालकी पर सवार होकर अपनी सखियों के साथ नगर में चली गयी। तब दोनों युवराज भी उसके पीछे चल पड़े। मालागढ़ का राज्य समतट देश की पश्चिमी सीमा के पार था। उसका राजा मालव्य अत्यंत क्रूर एवं युद्ध प्रिय था। उसका पुत्र माल्य भी अपने पिता ही के समान क्रूर और अहंकारी था। उसने अपनी पहली पत्नी को विवाह के दूसरे ही दिन छुरी भोंक कर मार डाला था, क्योंकि उस युवती ने उसके एक आदेश का पालन नहीं किया था। इसलिए वह युवराज अब दूसरी पत्नी की खोज में था। पर पिता और पुत्र दोनों ही शिवजी के बड़े भक्त थे। दूसरी ओर, अवंतिका राज्य समतट के उत्तर में था। उसका राजा अवनीश अत्यंत बलवान, फिर भी दयालु और सज्जन पुरुष था। उसका पुत्र अवंत भी सभी बातों में अपने पिता के समान था। उसका अभी तक विवाह नहीं हुआ था। राजकुमारों के नगर में प्रवेश करने का समाचार सुनते ही श्रावस्ती के पिता ने उन दोनों का अतिथि-सत्कार किया। माल्य ने राजा साम्य से कहा— "मुझे आपसे एक ज़रूरी बात करनी है।" माल्य की बात पूरी होने के पूर्व ही अवंत ने कहा— "राजन्, मुझे भी आप से एक मुख्य विषय पर चर्चा करनी है।" महाराजा साम्य ने शांतिपूर्वक कहा— "बेटे, तुम दोनों थके मालूम होते हो! मेरे अतिथि बनकर थोड़े दिन हमारे अतिथिगृह में विश्राम करो। दो-चार दिन बाद मैं तुम लोगों की बातें सुनूँगा।" तब तक राजा ने राजकुमारों को अतिथिगृह में ठहराने का अलग-अलग प्रबंध किया। दूसरे दिन सवेरे युवराज अवंत अतिथिगृह के सामने मैदान में टहल रहा था, तभी माल्य अचानक तलवार खींचकर उस पर टूट पड़ा। खड्ग-युद्ध में प्रवीण अवंत भी अपनी आत्मरक्षा करने लगा। पास के उद्यान में काम करने वाले माली ने यह देखा और शोर मचाया। सिपाही और अधिकारी दौड़कर आए और युद्ध को रोका। माल्य ने तर्क दिया— "राजकुमारी को पहले मैंने देखा, इसलिए उससे मेरा विवाह होना चाहिए। उसके बीच में आने वाले ये कौन होते हैं?" महाराजा साम्य अब उलझन में पड़ गए। दोनों राजकुमार योग्य वर थे, लेकिन अवंत का चरित्र बेदाग था, जबकि माल्य की क्रूरता के किस्से मशहूर थे। राजा ने अपने मंत्री से सलाह ली। मंत्री ने कहा— "राजकुमारी का अवंत के साथ विवाह करना ही उत्तम है, लेकिन माल्य एक खतरनाक और प्रतिशोधी व्यक्ति है। अगर हम उसे सीधे मना करेंगे, तो वह और उसके पिता हमारे देश पर हमला कर सकते हैं। हमें इसे युक्तिपूर्वक सुलझाना होगा।" मंत्री ने राजपुरोहित 'तंत्रशास्त्री' से मदद मांगी। तंत्रशास्त्री ने एक योजना बनाई। अगले दिन शिव मंदिर में सबको बुलाया गया। तंत्रशास्त्री ने दोनों राजकुमारों से कहा— "आप दोनों भगवान के नाम पर शपथ लें कि आप उनके निर्णय को स्वीकार करेंगे।" दोनों ने शपथ ली। तंत्रशास्त्री ने दो खाली गत्ते की पेटियाँ सामने रखीं, जिन पर क्रमशः माल्य और अवंत के नाम लिखे थे। उन्होंने सबके सामने दो कागज के टुकड़ों पर 'श्रावस्ती' का नाम लिखा और एक-एक पर्ची दोनों पेटियों में डाल दी। फिर पवित्र जल छिड़क कर प्रार्थना की— "हे महाशिव! हमारी राजकुमारी के लिए योग्य वर का चुनाव करें।" थोड़ी देर बाद तंत्रशास्त्री ने माल्य के नाम वाली पेटी खोली— वह खाली थी। फिर अवंत की पेटी खोली गई, तो उसमें से दो पर्चियां निकलीं, जिन पर 'श्रावस्ती' लिखा था। तंत्रशास्त्री ने घोषणा की— "महाशिव ने अवंत को पति के रूप में चुना है!" माल्य ने सिर झुकाकर इस दैवीय निर्णय को स्वीकार किया और वहां से चला गया। बाद में, जब मंत्री ने अकेले में तंत्रशास्त्री से इस 'जादू' का रहस्य पूछा, तो शास्त्री ने दिखाया कि पेटियों में दो गुप्त खाने (Double Bottom) थे। उन्होंने माल्य की पेटी में डाली गई पर्ची को गुप्त खाने में गिरा दिया था, जबकि अवंत की पेटी के गुप्त खाने में पहले से ही 'श्रावस्ती' नाम की दो पर्चियां छिपाई हुई थीं। तंत्रशास्त्री भगवान के नाम पर धोखा देने के कारण पश्चाताप में रोने लगे। लेकिन मंत्री ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा— "शास्त्री जी, आपने कोई पाप नहीं किया। आपने एक क्रूर व्यक्ति से एक मासूम कन्या और अपनी मातृभूमि की रक्षा की है। ऐसे नेक उद्देश्य के लिए किया गया छल पाप नहीं कहलाता। भगवान शिव आपको अवश्य क्षमा करेंगे।" यह सुनकर शास्त्री जी का मन हल्का हुआ और उन्होंने भक्तिपूर्वक अपनी आँखें बंद कर लीं।