जीत की हार
रामनगर में महेश नाम का एक कृषक युवक रहा करता था। वह स्वयं अत्यन्त मेधावी तथा शौकीन स्वभाव का था। साथ ही वह सुन्दर, संपन्न व बुद्धिमान भी था। इसी कारण अनेक गृहस्थ अपनी-अपनी कन्या का विवाह उसके साथ कराने के लिये ललचा रहे थे। पर महेश ने उनमें से किसी भी लड़की से विवाह करने से साफ़ इन्कार कर दिया।
अपने पोते का यह बर्ताव उसके दादा रामनाथ को बिल्कुल अच्छा न लगा। उसने एक दिन महेश को पास बुलाकर कहा, "देखो बेटे, इस प्रकार देखी हुई हर कन्या से विवाह करने से इन्कार किया तो तुम्हारी शादी कब होगी? तुम्हारी माँ को आराम कब मिलेगा?"
अपने दादा की इस बात पर हँसकर महेश बोला, "दादाजी, क्या माँ को कामकाज में मदद दिलाने के लिए ही मेरी शादी कराना चाह रहे हैं? यह बात पहले से ही मालूम होती, तो मैं कभी का एकाध अच्छी सी नौकरानी के गले में मंगलसूत्र बाँधकर उसे अपने घर ले आता!"
अपने पोते की इस विचित्र बात पर हँसकर रामनाथ बोला, "अरे, इन बातों को रहने दो। मगर याद रखो, तुम हर लड़की में ऐब दिखाकर शादी करने से इन्कार करते रहोगे, तो आख़िर तुम अपनी दादी जैसी औरत के चंगुल में फँस जाओगे।"
रामनाथ की यह बात सुनकर महेश की दादी बोली, "हाँ बेटा महेश! सीमित संपत्ति वाले परिवार में रहकर सब प्रकार के सुख प्रदान करने वाली औरत ज़हर के बराबर होती है न?"
महेश मुस्कुराकर बोला, "सूर्योदय से लेकर रात तक पूरा दिन पत्नी के बल पर ही तो गृहस्थी के काम-काज चलते रहते हैं। दादाजी, चाहे सदा घर के कामों में लगी रहने वाली हो, मगर लड़की में थोड़ी-बहुत चुस्ती और बुद्धिमता तो होनी चाहिये न? ऐसी लड़की जब मिलेगी, तभी मैं शादी करूँगा।"
उन्हीं दिनों, एक दिन रामनाथ का एक वृद्ध दोस्त गुरुनाथ, जो पड़ोस गाँव में रहता था, रामनाथ को देखने आ पहुँचा। दोनों में बातचीत शुरू हुई। उस वक्त उत्साहपूर्वक इधर-उधर टहलने वाले महेश को देखकर गुरुनाथ ने पूछा, "अरे रामनाथ, यह लड़का तुम्हारा पोता महेश तो नहीं?"
"हाँ हाँ दोस्त, यह लड़का मेरे ज्येष्ठ पुत्र मल्लिनाथ का बेटा महेश ही है।" रामनाथ ने कहा।
"ओह, ऐसी बात है! यह तो जवान हो गया है। इस की शादी की बात चल रही है या नहीं?" गुरुनाथ ने पूछा। रामनाथ ने अपने पोते की करतूत का परिचय दिया। इस पर गुरुनाथ ने चकित होकर कहा, "तब तो बड़ी अच्छी बात है। यह भी तो मेरी पोती गौरी जैसा ही चतुर है।"
"क्या तुम्हारी पोती भी ऐसी अक्लमन्द है?" रामनाथ ने पूछा।
"अबे, पोती किसकी है? गुरुनाथ को तुमने क्या समझ रखा है? अरे, मेरी गौरी की अक्लमन्दी के सामने तुम्हारे पोते की ऐसी की तैसी!" गुरुनाथ ने गर्व से कहा। गुरुनाथ की बातों से रामनाथ भी जोश में आ गया। फिर बोला, "तब तो मेरे पोते को ही इस बात का फ़ैसला करने दें।"
आखिर यह निश्चित हुआ कि महेश अकेला ही गुरुनाथ के साथ उसके घर जाएगा और यदि उसको गौरी पसन्द आये तो वह उस के साथ शादी करेगा। इसके बाद वे दोनों चल पड़े। घर में प्रवेश करते ही गुरुनाथ ने परिवार के सभी सदस्यों के नाम लेकर सब को पुकारा और सब से महेश का परिचय कराया — "यह लड़का मेरे मित्र रामनाथ का पोता है।"
बाद में अपनी पोती की ओर देखते हुए वह बोला, "गौरी, मेरे दोस्त रामनाथ अपने पोते की अक्लमन्दी पर फूले नहीं समा रहे हैं। मैंने तो यह दाँव लगाया है, कि मेरी पोती भी तुम्हारे पोते से किसी भी बात में कम नहीं है।" और यह कहकर ही मैं उसके इस पोते-महेश को अपने साथ ले आया हूँ।"
अपने दादा की बातों में ध्वनित विशेष भाव को गौरी ताड़ गयी और संकोच से उसका चेहरा लाल हो गया, आँखें नीची हो गयीं। अत्यन्त आकर्षक और चुस्त गौरी को देख महेश को लगा कि लड़की अक्लमन्द और चुस्त प्रतीत होती है।
गौरी को देख मंदहास करते हुए महेश बोला, "सुनो, मुझे बहुत प्यास लगी है। निकाले बिना, भरे बिना, मनुष्य के हाथों की पहुँच के ऊपर स्थित मीठा जल पिला सकोगी?"
मुस्कुराकर, सिर हिलाते गौरी बोली, "अभी पलभर में ले आती हूँ। क्या आप उस जल को वैसे ही पी जायेंगे, या मनुष्य के द्वारा निर्मित वस्तु के सहारे पियेंगे?"
"वैसे ही पी नहीं सकता। गिलास में ले आओ।" महेश उत्तर में बोला। उसने ताड़ लिया — लड़की तो होशियार लगती है।
थोड़ी ही देर में गौरी लोटा भर नारियल का पानी ले आयी। सब ने गौरी से पूछकर जान लिया कि लोटे में नारियल का पानी है, तब वे आश्चर्य में आ गये।
"बेटे, क्या तुम ने यही जल पूछा था?" प्रशंसा भरी दृष्टि से देखते हुए गुरुनाथ ने पूछा।
इस पर गुरुनाथ को चुनौती देते हुए महेश ने कहा, "आप अपनी पोती से कहिये कि अधमरी के लिये पूर्णरूप से मरने वाली के द्वारा सुखपूर्वक जीने वाले कौन होते हैं?"
गौरी तत्काल बोली, "अच्छी बात है, बता दूँगी। मगर इससे पहले आप यह बताने का कष्ट करें कि, इस प्रकार सुखपूर्वक जीने वाले लोग कितने दिनों में एक बार आपके घर आते हैं?"
"छी: छी:, वे लोग हमारे घर कभी नहीं आते।" मुँह सिकोड़कर महेश तुरन्त बोल उठा।
"हाँ समझ गयी हूँ। अधमरने वाले प्राणी आमिष (मांस) हैं, उनकी खोज में आकर पूर्णरूप से मरने वाली मछली है; और उन मछलियों को बेचकर सुखपूर्वक जीने वाले लोग मछुआरे!" गौरी ने सहजता से कहा।
अपनी पोती की अक्लमन्दी पर खुश होकर गुरुनाथ ने महेश से पूछा, "अब तुम्हारी परीक्षा समाप्त हो गयी है न?"
"नहीं जी, एक प्रश्न और है।" यह कहकर उसने गौरी से पूछा, "सुनो, प्रथम वस्तु का सेवन करने减 पर ही हमारी ज़िन्दगी गुज़रती है। दूसरी चीज़ के न रहने से गाँव के किसी भी घर में धोबन न आयेगी। तीसरी व चौथी वस्तु के न होने से हम जीवित नहीं रह सकते और अगर ये अधिक मात्रा में हो जायें अथवा एक दूसरे के सहायक बनें तो सर्वनाश करेंगी। अब रही पाँचवीं वस्तु — वह तो अनन्त है। अच्छा, अब बताओ ये पाँच चीज़ें क्या-क्या हैं?"
गौरी ने मृदुल मंद हास किया, फिर नतमस्तक हो जवाब देने की असमर्थता स्वीकार करते हुए सिर हाथों में छिपा लिया। महेश ने विजय-गर्व से एक बार गुरुनाथ की ओर देखा और फिर हँसकर बोला, "मैं और मेरे दादा ही जीत गये न? दाँव की वस्तु कहाँ है?"
गुरुनाथ की समझ में न आया कि क्या उत्तर दें। वह तो पसोपेश में पड़ गया। यह भाँपकर महेश बोला, "हमें कुछ नहीं चाहिये। आप की गौरी को हमारे घर की बहुरानी बनाकर भेज दीजिये; बस!"
इस के एक महीने के अन्दर ही गौरी और महेश का विवाह बड़ी धूमधाम से कराया गया। विवाह के बाद गौरी ससुराल पहुँची। एक दिन उसने पति से कहा, "अजी सुनिये, आप से एक बात करनी है।"
"अच्छा? बताओ क्या बात है?" महेश ने उत्सुकता से पूछा।
"अं, विवाह के पूर्व, उस दिन आप ने मुझसे..." (कहानी यहाँ समाप्त होती है)