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दयालु भूत

माधव किसी काम से शहर गया, अपना काम पूरा करके सूर्यास्त के समय गाँव की ओर चल पड़ा। उसका विचार था कि तेज चलने पर वह आधी रात तक अपने घर पहुँच सकता है! मगर रास्ते में पड़ने वाले जंगल तक पहुँचते ही पानी बरसने लगा। वर्षा के थम जाने तक वह कांपते हुए एक पेड़ के नीचे खड़ा रहा और फिर उसने अपनी यात्रा चालू की, फिर भी वह आधी रात तक आधा जंगल ही पार कर पाया। जोर की सर्दी पड़ रही थी। थोड़ी दूर पर सियारों और भेड़ियों की चिल्लाहटें सुनाई दे रही थीं। इसलिए माधव ने सोचा कि एक सुरक्षित स्थान देखकर सवेरे तक वहीं पर रुकना ज़्यादा अच्छा होगा। भाग्यवश रास्ते से हटकर थोड़ी दूर पर माधव को एक बहुत बड़ा बरगद दिखाई दिया। उस पेड़ के तने में सर छुपाने लायक एक खोखला उसे दिखाई दिया। इसलिए माधव खोखले के अन्दर जाकर बैठ गया। जल्द ही उसकी आँख लगी। थोड़ी देर बाद ऊपर से खन-खन की आवाज हुई, माधव ने चौंककर आँखें खोल कर देखा। तीन भूत अंजुलियाँ भरकर खोखले के अन्दर पैसे उड़ेल रहे थे। उन भूतों को देख माधव घबरा कर चिल्ला उठा। "घबराओ मत! हमको देख तुम पागल की तरह क्यों चिल्लाते हो?" भूतों ने पूछा। थोड़ा संभलकर माधव ने जवाब दिया— "क्योंकि तुम लोग भूत हो, इसलिए!" "सभी भूत एक से नहीं होते, हम तो दयालु भूत हैं!" एक भूत ने समझाया। "ओह, ऐसी बात है! आज के जमाने के आदमी किसी बात में भूतों से कम नहीं होते! फिर भी मनुष्यों के अन्दर यह गलत धारणा घर कर गई है कि भूत तो खराब होते हैं और मनुष्यों के साथ दोस्ती नहीं करना चाहते!" एक और भूत बोला। "इसी वास्ते हम इस खोखले में रुपये छिपाते हैं, मनुष्य तो धन पर जान देता है! तुम तो अच्छे मौके पर हमारी नज़रों में पड़ गये। तुम यह सारा धन अपने गाँव वालों में बाँटकर उनके साथ हमारी दोस्ती करा दो।" तीसरा भूत बोला। ये बातें सुनने के बाद भी माधव को गूंगे जैसे मौन देख तीनों भूत उससे गिड़गिड़ाने लगे— "देखो भाई, तुम हमारा यह काम करके पुण्य कमा लो!" "लोग भूतों के नाम से ही डरते हैं, मैं उन्हें समझाऊँगा कि यह धन तुम लोगों से पुरस्कार के रूप में प्राप्त हुआ है, मैं उनका डर दूर करूँगा।" यों कहकर माधव ने सारे रुपये ले लिये। "सुनो भाई, तुम अगर यह काम करोगे तो हम तुम्हारे इस उपकार को कभी नहीं भूल सकते! तुम कल रात को फिर यहाँ पर आ जाओ।" यों कहकर भूत गायब हो गये। अब सवेरा होने को था, माधव वह सारा धन लेकर खुशी-खुशी घर पहुँचा। "क्या शहर में तुम्हारा काम जल्दी हो गया? या फिर से जाना पड़ेगा? लेकिन तुम्हारे कंधे पर यह गठरी कैसी?" माधव की पत्नी ने पूछा। "अरी पगली! मेरे कंधे पर हमारी किस्मत की गठरी पड़ी हुई है! अब हम शहर में अपना घर बसाकर ऐश-आराम करेंगे!" यों कहते माधव ने सारे रुपये फर्श पर गिराये और सारी कहानी अपनी पत्नी को सुनाई। "उफ़! तुम्हारी अक्ल पर पानी फिर गया है। इस थोड़े से धन को लेकर हम शहर में कैसे अपनी गृहस्थी चला सकते हैं? भूतों ने तुम्हें आज रात को फिर बुलाया है न? जाओ, थोड़ा और धन लेते आओ!" यों कहकर उसने अपने पति को कोई उपाय भी बताया। रात को भूत उसी बरगद के पास माधव का इंतज़ार करने लगे। माधव को देखते ही उत्साह में आकर भूत पूछ बैठे— "बताओ, हमारी भेंट पाकर बच्चों ने तुमसे क्या कहा?" "ओह, क्या बताऊँ! बच्चे इतने खुश हो गये और पूछने लगे कि हमें अपने काकाओं को जल्दी दिखला दो!" माधव ने जवाब दिया। "वाह, बड़ी अच्छी बात है! तब तो चलो न!" भूत खुशी में आकर एक स्वर में पूछ बैठे। "जल्दबाजी मत करो! बच्चों के खुश हो जाने से क्या फ़ायदा! बड़ों को भी खुश हो जाना चाहिए न? बच्चों को पालने वाले लोग वे ही होते हैं! उन्हें भी थोड़ा धन देकर खुश करना है! हाँ, तुम लोगों का यह कहना सच है कि सचमुच मनुष्यों के भीतर धन के प्रति बड़ी लालच है और धन के पीछे अपनी जान देते हैं!" माधव ने कहा। इस पर भूतों ने बड़ों को खुश करने के लिए माधव के हाथ थोड़ा धन और दिया। माधव की पत्नी उस धन को देख बोली— "ये भूत तो पागल मालूम होते हैं। अब उनसे थोड़ा धन और वसूल करके हमें सदा के लिए उनका पिंड छुड़ाना होगा! इस वास्ते तुम एक काम करो। भूतों से कह दो कि एक दिन रात को गाँव वालों को चौपाल के यहाँ इकट्ठा करोगे, तब उनसे दोस्ती कर लें! अगर भूत इस बात को मान गये तो ऐसा करो!" यों समझाकर माधव की पत्नी ने उसे कोई योजना बताई। माधव अपनी पत्नी की अक्लमंदी पर मन ही मन खुश हुआ। उस दिन रात को भूतों के पास पहुँचकर बोला— "तुम लोगों की भेंट पाकर गाँव के सारे बड़े लोग फूले न समाये। मगर अंधविश्वास रखने वाली कुछ औरतें संतुष्ट न हुईं, उन्हें भी खुश करना ज़रूरी है!" यों समझाकर भूतों से माधव ने थोड़े रुपये और लिये और उन्हें बताया कि दूसरे दिन रात को वे चौपाल के पास पहुँचें। दूसरे दिन सवेरे माधव ने गाँव वालों को बताया— "आज रात को भूत चौपाल के पास दिखाई देंगे, जो लोग उन्हें खुद अपनी आँखों से देखना चाहते हैं, वे सब चौपाल के पास पहुँच जायें।" गाँव के लोग कुतूहल में आकर जल्द ही खाना खाकर चौपाल के पास पहुँचे। माधव ने गाँव वालों को समझाया— "हम सब एक ही गाँव के निवासी हैं, इसलिए मैं सच्ची बात बता देता हूँ। इधर कुछ दिन पहले मुझे अपने दूर के एक रिश्तेदार की काफी संपत्ति मिल गई है। उसमें से थोड़ा धन खर्च करके हमारे गाँव में एक चिकित्सालय बनाना चाहता हूँ, जहाँ पर मुफ्त में दवाएँ दी जायेंगी, मगर रात को निद्रा के समय तीनों भूतों ने आकर मुझे जगाया और धमकी दी कि मैं चिकित्सालय न बनाऊँ। भूतों ने यह बात भी बताई कि इधर उनके लोक में पहुँचने वालों की संख्या खूब घट गई है। कहते थे कि आज रात को हमारे गाँव आकर कुछ लोगों को वे अपने साथ ले जाने वाले हैं। आप सब लोग हिम्मत के साथ उन भूतों का सामना करके उन्हें भगा दीजिए!" इसके बाद आध घड़ी के अन्दर तीनों भूत बड़ी खुशी के साथ मुस्कुराते हुए गाँव के लोगों के पास पहुँचे। उन्हें देखते ही कुछ लोग डर के मारे भाग गये, लेकिन कुछ साहसी लोगों ने हिम्मत करके उन पर जूते व पत्थर फेंकना शुरू किया। तीनों भूतों ने बड़ी सहनशीलता के साथ हाथ जोड़कर निवेदन किया— "भाइयो, जल्दबाजी मत कीजियेगा! हम लोग यहाँ पर तुम्हें हानि पहुँचाने के लिए नहीं आये हैं, तुम से दोस्ती करने आये हैं!" फिर भी लोग उन भूतों पर पत्थर व जूते बरसाने लगे। तब भूत निराश होकर वहाँ से चले गये। भूतों के थोड़ी दूर जाने पर माधव उनसे मिला और बोला— "देखते हो न? मनुष्य कैसे स्वार्थी होते हैं? उन्हें तो तुम लोगों का धन चाहिए, लेकिन वे तुम से दोस्ती करना तो नहीं चाहते। ये लोग भी कैसे विश्वासघाती हैं?" इस पर भूतों ने बड़ी शांति के साथ कहा— "यह बात तुम मत भूलो कि तुम भी मनुष्य हो! हम इस बात को हमेशा के लिए याद रखेंगे।" यों कहकर भूत उसी वक्त गायब हो गये। "उफ़! पिंड छूट गया!" माधव के मुँह से निकल पड़ा, तब वह घर की ओर चल पड़ा। घर पहुँचकर वह देखता क्या है कि उसका घर लूटा गया है। कल रात को उसने गाँव वालों से कहा था कि उसे किसी रिश्तेदार की काफी संपत्ति मिल गई है, इस बात को चोरों ने सुन लिया। उसके घर में घुसकर उसकी पत्नी को खंभे से बांध दिया, तब भूतों से माधव को जो धन मिला था, उसके साथ माधव की गाढ़ी कमाई को भी लूट ले गये। माधव अपनी पत्नी के बंधन खोलते हुए पश्चाताप का अभिनय करते बोला— "चाहे मनुष्यों के साथ धोखा दे या भूतों के साथ! धोखा तो आखिर धोखा ही होता है! इसका प्रायश्चित करना ही पड़ेगा!"