दो बेरोज़गार
परशुराम के पिता रामशरण की बुढ़ापे के कारण मृत्यु हो चुकी थी। अब परशुराम को पता चला कि दायित्व क्या होता है। उसकी उम्र उस समय पच्चीस साल से ऊपर हो चली थी, पर उसका मन किसी काम में नहीं था। वह अपना समय अपने हमउम्र और बेकार युवकों के साथ घूमने-फिरने तथा जुआ खेलने में बर्बाद करता था। जब तक रामशरण ज़िंदा था, वह परशुराम को किसी बात से मना नहीं करता था। वह जानता था परशुराम माँ के प्रेम से वंचित है।
पिता के देहांत के बाद परशुराम ने काफी कर्ज़ चढ़ा लिया जिसे उतारने के लिए उसे अब अपना घर तक बेच डालना पड़ा। गांव में उसकी आदत से हर कोई परिचित था, इसलिए उसे कोई काम देने को तैयार भी न था। वह तो गांववालों की नज़रों में एक आवारा और बेकार युवक था।
एक बार उसने काम के लिए काफी कोशिश की। वह खूब घूमा, पर उसे कहीं काम न मिला। वह बेहद थक गया था, और यह भी जान गया था कि गांव में उसे कोई नौकरी नहीं देगा। इसलिए एक शाम वह अपने गांव से निकल पड़ा ताकि कहीं और काम की तलाश करे। चलते-चलते वह एक जंगल में पहुंचा। तब तक अंधेरा हो चुका था। फिर तूफान आ गया और पानी भी बरसने लगा। परशुराम की समझ में नहीं आ रहा था कि वह कहां आश्रय पाये और रात बिताये। वह पेड़ों के नीचे-नीचे होकर चल रहा था। तभी उसे थोड़ी दूरी पर कुछ रोशनी दिखाई दी। वह उस रोशनी की ओर ही चल पड़ा।
वह रोशनी एक पुराने, टूटे मंदिर से आ रही थी। वह देवी का मंदिर था। वहां भीतर एक दीप जल रहा था और एक युवक उस जगह को कपड़े से साफ कर रहा था। परशुराम को देखते ही वह बोला, "लगता है काफी भीग गये हो। पहले अपने सर के बाल अच्छी तरह पोंछ लो और उन्हें सुखा लो," और यह कहकर उसने उसे एक सूखा कपड़ा दिया।
परशुराम ने उस कपड़े से अपना सर पोंछा और कपड़े भी बदल लिये। युवक ने परशुराम को अपना नाम यतींद्र बताया। उसने यह भी कहा कि वह नौकरी ढूंढने निकला है, पर रास्ते में बारिश आ गयी जिससे वह यहां रुक गया। फिर उसने परशुराम से पूछा कि वह क्या करता है। परशुराम ने कुछ नहीं छिपाया और अपने बारे में यतींद्र को सब कुछ साफ-साफ बता दिया।
यह सुनकर यतींद्र हंस दिया और बोला, "तब तो हम दोनों एक ही नाव के सवार हैं। चलो, अच्छा हुआ, मुझे एक हमसफर मिल गया।" फिर उसने अपने साथ लायी रोटियों की पोटली खोली और दोनों मिलकर खाने लगे। भूखे तो दोनों ही काफी थे, इसलिए मिल-बांटकर खाने में उन्हें बड़ा आनंद आया। यतींद्र ने जो जगह साफ की थी, वहीं दोनों लेट गये।
अब बात परशुराम ने शुरू की, "आज तक मैंने नौकरी के लिए जी-तोड़ कोशिश नहीं की थी, लेकिन ऐसी कोशिश करने वालों के बारे में मैंने काफी कुछ सुन रखा है कि नौकरी पाने के लिए बड़े-बड़े लोगों की सिफारिश तो ज़रूरी ही, रिश्वत भी देनी पड़ती है। बिना इसके नौकरी पा लेना लगभग असंभव ही है।"
"तुम ठीक कहते हो। पर हम लाचार हैं। हां, इतनी बात जरूर है कि अगर हमें कोई नौकरी दे तो हम पूरी ईमानदारी से काम करेंगे और उसमें अपनी जी-जान लगा देंगे।" यतींद्र ने कहा।
"तुम्हें वह अवसर मैं दिलवा दूंगी।" यह आवाज़ एक देव-स्त्री की थी जो वहां एकाएक प्रकट हुई थी। यतींद्र और परशुराम ने उसे फौरन पहचान लिया। वह उसी मंदिर की देवी थी। उन्होंने उसे साष्टांग प्रणाम किया और कहा, "माते! इन दो बेकारो पर तुम्हारी कृपा हुई, हम धन्य हैं! हम जीवन-भर तुम्हारे प्रति कृतज्ञ रहेंगे। पर कृपया यह भी बता दो कि तुम हमारी किस तरह मदद करना चाहती हो?"
इस पर देवी बोली, "मैं तुम दोनों को तीन चमत्कारी वस्तुएं दूंगी। तुम तीन दिन बाद यहां वापस आना और मुझे बताना कि उनके माध्यम से तुम्हें क्या प्राप्त हुआ।" "जैसा तुम्हारा आदेश, माते!" परशुराम और यतींद्र दोनों एकाएक बोले।
तब देवी ने उन दोनों को:
एक-एक मिट्टी का बर्तन दिया और कहा, "इसे ज़मीन पर पटककर फोड़ देना। फोड़ते समय जिसका तुम ध्यान करोगे, वही तुम्हारे सामने प्रकट हो जायेगा।"
एक-एक काली मिर्च दी और बोली, "इसे अपने मुंह में डालकर तुम उससे जो भी मांगोगे, वह देगा!"
एक-एक तांबे की अंगूठी देते हुए कहा, "यह जब तक तुम्हारी उंगली पर रहेगी, तब तक उन दोनों वस्तुओं से जो भी तुम्हें प्राप्त होगा, वह तुम्हारे पास रहेगा।"
और देवी वहां से अदृश्य हो गयी।
सुबह होने वाली थी। उधर बारिश भी रुक गयी थी। यतींद्र परशुराम से बोला, "मैं पूरब की ओर जा रहा हूं। चाहो तो मेरे साथ चल सकते हो।" "मैं पश्चिम की ओर जाऊंगा।" परशुराम बोला, "तीसरे दिन, जैसा कि हमने देवी को वचन दिया है, हम यहीं, इसी मंदिर में मिलेंगे।"
परशुराम अब पश्चिम की ओर जा रहा था। उसने महलनुमा भवन के सामने मिट्टी का बर्तन फोड़ा और ध्यान किया कि उस मकान का मालिक उसके सामने आ जाये। थोड़ी देर में एक अधेड़ स्त्री दरवाज़ा खोलकर उसके सामने आ खड़ी हुई। उसके शरीर पर सोने के गहने थे।
परशुराम ने अब वह काली मिर्च अपने मुंह में रख ली और उस स्त्री से बोला, "आपके पास जितना भी सोना है, आप फौरन मुझे दे दीजिए।" स्त्री ने अपना सर पीछे की ओर घुमाया और ज़ोर-ज़ोर से चीखने लगी, "सोना! सोना!" 'सोना' दरअसल उसके कुत्ते का नाम था। मालकिन की आवाज़ सुनकर वह कुत्ता वहां आया और उसने परशुराम की टांग अपने मुंह में ले ली और उसमें दांत गड़ा दिये।
परशुराम को गहरा घाव आया। उसे फौरन याद आया और उसने अपनी उंगली से तांबे की अंगूठी निकालकर फेंक दी। तब कहीं उस कुत्ते ने परशुराम को छोड़ा। परशुराम दो दिन तक जड़ी-बूटियों से कुत्ते के काटे का इलाज करता रहा और तीसरे दिन गिरते-पड़ते मंदिर पहुंचा।
देवी उसका इंतज़ार कर रही थी। थोड़ी देर में यतींद्र भी वहां आ पहुंचा। वह बढ़िया कपड़े पहने हुए था। यतींद्र ने बताया, "मैं यहां से सीधे राजधानी पहुंचा। वहां मैंने मिट्टी का बर्तन फोड़ा और राजा का ध्यान किया। थोड़ी देर में राजा वहां आ पहुंचे। मैंने काली मिर्च मुंह में रख ली और उनसे विनती की— 'राजन्, मुझे अपने दरबार में किसी काम पर रख लीजिए। आपकी बड़ी कृपा होगी।' राजा मुस्कुराये और बोले— 'तुम्हें काम हमने दे दिया समझो। तुम जब चाहो आ जाओ।' इस तरह मुझे नौकरी मिल गयी और अग्रिम राशि भी मिली।"
यतींद्र ने अपनी उंगली से अंगूठी उतारकर देवी को देते हुए कहा, "मां, मुझे अब अपनी शक्ति पर विश्वास है। तुम्हारी कृपा से मैं अपनी नौकरी को बरकरार रख पाऊंगा, क्योंकि मैं जो काम करता हूं, पूरी निष्ठा से करता हूं।"
देवी ने दोनों को संबोधित करते हुए कहा, "मैंने तुम दोनों को एक-सी वस्तुएं दी थीं, लेकिन परशुराम का इरादा ठीक नहीं था; इसलिए वह उनसे कोई लाभ नहीं उठा सका। यतींद्र अपनी काली मिर्च के बल पर यदि राजा से आधा राज भी मांगता तो वह दे देता। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।" और इतना कहकर देवी अंतर्ध्यान हो गयी।
अगले रोज़ यतींद्र राजधानी जाने लगा तो परशुराम भी उसके साथ चल पड़ा, यह सोचकर कि वह यतींद्र के साथ रहकर बहुत कुछ सीखेगा और मेहनत से काम करेगा।