धन और दान
शिवपुरी गाँव में धर्मचन्दन नाम का एक पंडित रहता था। उसकी पत्नी रमादेवी परम कंजूस थी। वह एक पाई भी खर्च किये बिना अधिक से अधिक पुण्य जोड़ना चाहती थी।
एक दिन झाड़ू बेचनेवाली एक औरत उसके मकान से होकर गुज़र रही थी। उसको बुलाकर एक पुरानी साड़ी रमादेवी ने उसके सामने रखी और पूछा, “यह साड़ी लेकर कितने झाड़ू दोगी?”
“दो!” उस बूढ़ी औरत ने कहा।
“क्या कहा? एक साड़ी के दो ही झाड़ू? छी: छी:! यही साड़ी अगर किसी गरीब औरत को दान में दे दूँ, तो मुझे बहुत सा पुण्य प्राप्त होगा। अच्छा, बोलो एक रुपये में कितने झाड़ू दोगी?” रमादेवी ने पूछा।
“चार!” बूढ़ी ने कहा।
रमादेवी ने एक रुपया देकर चार झाड़ू खरीदे। बूढ़ी वहाँ से जब जाने लगी, तब उसने साड़ी भी अपने कन्धे पर डाल ली।
यह देख रमादेवी गुस्से में आकर बोली, “अै? धन के साथ साड़ी भी उठा ले जा रही हो? वाह रे वाह, क्या चालाक हो तुम भी!”
बूढ़ी धीरे से हँस पड़ी और बोली, “माई जी, आप तो बड़ी धर्मात्मा हैं। मुझे जैसी गरीबिन को साड़ी देकर आपने बहुत सा पुण्य कमाया है। धन देकर आपने घर के लिये झाड़ू खरीदे।”
विस्मय में आकर रमादेवी बूढ़ी औरत की ओर ताकती ही रही!