फरारी पति, लक्ष्मी जैसी पत्नी
भोर होते ही घड़ा लेकर राधा पानी भरने के लिए गाँव के बाहर स्थित बाग की बावड़ी (कुएँ) की ओर निकली। अँधेरा होने के बावजूद, अभ्यास के कारण सीढ़ियाँ उतरकर राधा ने घड़ा तो भर लिया, लेकिन अचानक उसके हाथ से घड़ा छूटकर कुएँ में गिर गया। इससे वह परेशान हो गई और सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आई। 'क्या कोई मदद के लिए मिलेगा?' इस उम्मीद में वह इधर-उधर देखने लगी।
इतने में पास के आम के पेड़ के पीछे से एक युवक बाहर आया और बोला— "मैंने बहुत से गाँव देखे हैं, लेकिन आपके गाँव की बात ही कुछ और है। पहाड़ों की गोद में, फलों के बगीचों और सुंदर प्रकृति से सजा यह गाँव मुझे बहुत पसंद आया।" क्षण भर रुककर, उसकी ओर गौर से देखते हुए वह बोला— "इतनी सुबह एक स्त्री का ऐसी सुनसान जगह पर अकेले आना..."
घबराहट की स्थिति में उसे पल भर देखते हुए खुद को संभालते हुए राधा बोली— "हर दिन मेरी बुआ ही पानी लेने आती हैं, लेकिन उन्हें बुखार है। अगर वह जाग जातीं तो मुझे पानी लाने नहीं देतीं, इसीलिए मैं अँधेरे में ही पानी ले जाने आई थी। लेकिन मेरे हाथ से घड़ा छूटकर कुएँ में गिर गया है। अगर आपको तैरना आता हो, तो क्या आप घड़ा निकाल देंगे?"
"तैरना? अरे, मैं तो बहुत अच्छा तैराक हूँ।" ऐसा कहकर उस युवक ने अपना अंगरखा (कुर्ता) उतारकर पेड़ पर लटका दिया और कुएँ में छलांग लगा दी। कुछ ही देर में वह भरा हुआ घड़ा लेकर बाहर आ गया।
राधा बहुत खुश हुई। घड़ा सिर पर रखते हुए वह बोली— "आपने मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है।" ऐसा कहकर वह घर की ओर चल दी। अपना कुर्ता पहनते हुए उसने कहा— "मदद करने वाले को अपना नाम तक नहीं बताया, मेरा नाम मोहन है।" आगे बढ़ते हुए राधा ज़ोर से बोली— "मेरा नाम राधा है।"
अगले दिन भी सुबह-सुबह पानी लेने आई राधा ने कुएँ से घड़ा भर लिया। जब वह सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आ रही थी, तो पास के बकुल के पेड़ के पास खड़े मोहन पर उसकी नज़र पड़ी। लेकिन पहले की तरह ही वह अनदेखा कर आगे बढ़ गई। तब मोहन हँसते हुए बोला— "आपकी बुआ का बुखार कम नहीं हुआ, भगवान ने मेरी मन्नत पूरी की। मैं आपको फिर से देख पाया!"
"दूसरों को कष्ट हो ऐसा चाहने वालों के मुँह में भगवान का नाम?" राधा तंज कसते हुए बोली। इस पर मोहन ने कहा— "मेरी मन्नत से आपको परेशानी हो रही है या आपकी बुआ को?"
"मेरी बुआ को आपके बारे में अभी कुछ नहीं पता, अगर पता चला तो वह घायल नागिन की तरह भड़क उठेंगी। हमारे परिवार में महिलाएँ पराये मर्दों से इस तरह बात नहीं करतीं।" ऐसा कहकर राधा तेज़ी से वहाँ से चली गई।
इसके बाद हर सुबह कुएँ के पास बातें करते हुए चार दिनों में मोहन ने उसका विश्वास जीत लिया। एक दिन सुबह उसने कहा— "मैं इस खूबसूरत गाँव को छोड़कर कल वापस जा रहा हूँ। यह गाँव और यहाँ का वातावरण मुझे बहुत पसंद आया है, पर तुम मुझे इन सबसे ज़्यादा पसंद आई हो। इसलिए कल वापस जाने के बाद, मैं अपने घर के बड़ों को तुम्हारे घर के बड़ों से बात करने के लिए लेकर आऊँगा और तुम्हें हमेशा के लिए अपने गाँव ले जाऊँगा।"
राधा बिना कुछ बोले लड़खड़ाते कदमों से घर पहुँची। उसका मन बहुत बेचैन था। ऐसी स्थिति में वह अक्सर अपनी सहेली नंदिनी के पास जाया करती थी। उस दिन उसकी मानसिक स्थिति भांपकर नंदिनी ने बेचैनी का कारण पूछा। राधा ने उसे शुरू से अंत तक सब कुछ बताया और यह भी बताया कि मोहन उससे विवाह करना चाहता है।
यह सब सुनकर नंदिनी बोली— "पगली, यह तो खुशी की बात है, तू इतनी निराश क्यों हो रही है?" इस पर उदास स्वर में राधा बोली— "वह राजा के सिपाहियों की नज़रों से बचकर भागने वाला एक अपराधी है!" उसने अपनी सहेली को एक चिट्ठी दिखाई जिसे देखकर नंदिनी हैरान रह गई। चिट्ठी में लिखा था— "मोहन! राजा के सिपाही तुम्हारी तलाश कर रहे हैं। किसी अनजान गाँव में चले जाओ।"
यह पढ़कर नंदिनी सन्न रह गई, लेकिन उसके चेहरे पर सवाल बने हुए थे। राधा ने बताया— "यह चिट्ठी पहले ही दिन उसके कुर्ते से गिरी थी जब उसने उसे पेड़ पर टाँगा था। मैंने उत्सुकता के कारण उसे उठाकर अपने पास रख लिया था।"
कुछ देर सोचकर नंदिनी बोली— "वह अपराधी है और सिपाही उसके पीछे हैं, यह जानने के बाद भी तुम उससे बात करती रहीं। इससे साबित होता है कि तुम उसे पसंद करती हो। अब ऐसा करो, कल जब वह मिले तो उससे कहना— 'शादी से पहले हमें एक-दूसरे के बारे में पूरी जानकारी होना ज़रूरी है, इसलिए आप अपनी पूरी सच्चाई बताइये'।"
सहेली की सलाह मानकर अगले दिन राधा ने मोहन से वही पूछा। इस पर मोहन थोड़ा मुस्कुराया और बोला— "यह तो अच्छी बात है, पर तुमने मुझे अपने बारे में कितना बताया? माता-पिता के न होने पर तुम्हारी बुआ तुम्हें कितना प्रताड़ित करती है, क्या तुमने मुझे यह सच बताया?"
यह सुनते ही राधा की आँखें भर आईं। मोहन उसे समझाते हुए बोला— "तुम्हारे बारे में सब जानने के बाद ही मैंने तुम्हें अपनी जीवनसंगिनी बनाने का निश्चय किया है। इतना दुख सहकर भी तुम मुस्कुराती कैसे रहती हो, भगवान ही जाने!"
आँखें पोंछते हुए राधा ने कहा— "किस्मत में जो कष्ट हैं, उन्हें सहते हुए टूट जाना ठीक नहीं।"
मोहन बोला— "तुम्हारे इन्हीं गुणों पर मोहित होकर मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ।"
राधा ने धीमी आवाज़ में पूछा— "आपको ऐसा क्यों लगा कि एक गुणवान लड़की किसी फरारी अपराधी से शादी करने को तैयार हो जाएगी?"
इस सवाल से हैरान मोहन को उसने वह चिट्ठी दिखाई। चिट्ठी देखकर मोहन ज़ोर से हँसा और बोला— "इसमें लिखा संदेश मेरे लिए ही है, लेकिन यह चिट्ठी किसने और क्यों लिखी, यह तो जान लो।" फिर मोहन ने अपनी पूरी सच्चाई बताई।
उसके पिता लक्षाधिपति (अमीर) थे और उन्हें पैसे के अलावा कुछ नहीं सूझता था। लेकिन उसकी माँ का स्वभाव बिल्कुल उल्टा था। पिता ने मोहन की शादी एक बहुत अमीर व्यापारी की बदसूरत लड़की से तय कर दी थी। मोहन को उस लड़की से शादी करने के बजाय सन्यास लेना बेहतर लग रहा था। माँ उसके मन की बात जानती थी। उसने सलाह दी कि शादी का मुहूर्त चार दिन बाद है, तब तक मोहन किसी दोस्त के यहाँ छिप जाए। इससे लड़की का पिता अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए अपनी बेटी की शादी किसी और से कर देगा और मुसीबत टल जाएगी।
योजना के अनुसार मोहन एक दोस्त के पास छिपा था, लेकिन उसके पिता ने बेटे के लापता होने की शिकायत सरकार (राजा) के दरबार में कर दी। जब माँ को यह पता चला कि सिपाही उसे ढूंढ रहे हैं, तो उसने एक पुराने वफादार नौकर के हाथ यह चिट्ठी भेजी कि वह गाँव छोड़कर कहीं दूर चला जाए।
"यह है मेरी पूरी कहानी। अब तुम्हें सब पता है, क्या अब भी तुम्हें इस विवाह से आपत्ति है?" ज़मीन की ओर देखते हुए मोहन ने पूछा।
राधा ने मुस्कुराते हुए कहा— "मुझे मूर्ख कहो या अनपढ़, लेकिन सही-गलत समझने की अक्ल तो भगवान ने मुझे दी ही है।"
मोहन बोला— "इस सवाल का जवाब शादी के बाद मेरी माँ देगी। मेरे पिता को जब पता चलेगा कि उन्हें लक्ष्मी जैसी बहू मिली है, तो वह अपनी नाराज़गी भूल जाएँगे।" ऐसा कहकर मोहन अपने माता-पिता को लाने के लिए अपने गाँव की ओर निकल पड़ा।