गर न अन्दोहे-शबे-फ़ुरक़त बयां हो जाएगा
गर न अन्दोहे[1]-शबे-फ़ुरक़त[2] बयां हो जाएगा
बे-तकल्लुफ़, दाग़-ए-मह[3] मुहर-ए-दहां[4] हो जाएगा
ज़हरा[5] गर ऐसा ही शाम-ए-हिज़र[6] में होता है आब[7]
पर्तव-ए-माहताब[8] सैल-ए-ख़ान-मां[9] हो जाएगा
ले तो लूं सोते में, उस के पांव का बोसा[10], मगर
ऐसी बातों से वह काफ़िर बद-गुमां[11] हो जाएगा
दिल को हम सरफ़-ए-वफ़ा[12] समझे थे क्या मालूम था
यानी यह पहले ही नज़र-ए-इम्तिहां[13] हो जाएगा
सब के दिल में है जगह तेरी, जो तू राज़ी हुआ
मुझ पे गोया इक ज़माना मेहर-बां हो जाएगा
गर निगाह-ए-गरम[14] फ़रमाती रही तालीम-ए-ज़ब्त[15]
शोला ख़स[16] में जैसे, ख़ूं रग में निहां[17] हो जाएगा
बाग़ में मुझ को न ले जा, वरना मेरे हाल पर
हर गुल-ए-तर[18] एक चश्म-ए-ख़ूं-फ़िशां[19] हो जाएगा
वाए[20], गर मेरा-तेरा इंसाफ़ महशर[21] में न हो
अब तलक तो, यह तवक़्क़ो[22] है कि वां हो जाएगा
फ़ायदा क्या! सोच, आख़िर तू भी दाना[23] है 'असद '
दोस्ती नादां[24] की है, जी का ज़ियां[25] हो जाएगा