देखा है
<p dir="ltr">कविता का शिर्षक है "हमने देखा है"<br>
लेखक -राम लोहार</p>
<p dir="ltr">फूलो को बे मौसम ही,झड़ते हुए देखा है।<br>
हमने अपनों को अपनों से ,बिछड़ते हुए देखा है।।1।।</p>
<p dir="ltr">जहाँ गिरा करती थी,मुहब्बतों की बारिशे कभी।<br>
उन धरातलों पर हमने सुखा  देखा है।।2।।</p>
<p dir="ltr">बन्धनों में बन्धे हुए, रिश्तों को भी टूटते  देखा है।<br>
हमने बन्द मुट्ठी से,रेत को फिसलते हुए देखा है।।3।।</p>
<p dir="ltr">मिलाते थे जो हाथ कभी हम से हँस-हँस कर,इस तम में उन्हें हाथ छुड़ाते हुए देखा है।</p>
<p dir="ltr">हमने नदियों को समुद्र से बिछड़ते हुए देखा है।अपनों को अपनों से झगडे हुए देखा है।<br>
।।4।।</p>
<p dir="ltr">वक्त की परछाई में कहा गुम है वो सितारे ,जिन्हें हमने गहन अंधकार में भी चमकते हुए देखा है।।5।।<br></p>
लेखक -राम लोहार</p>
<p dir="ltr">फूलो को बे मौसम ही,झड़ते हुए देखा है।<br>
हमने अपनों को अपनों से ,बिछड़ते हुए देखा है।।1।।</p>
<p dir="ltr">जहाँ गिरा करती थी,मुहब्बतों की बारिशे कभी।<br>
उन धरातलों पर हमने सुखा  देखा है।।2।।</p>
<p dir="ltr">बन्धनों में बन्धे हुए, रिश्तों को भी टूटते  देखा है।<br>
हमने बन्द मुट्ठी से,रेत को फिसलते हुए देखा है।।3।।</p>
<p dir="ltr">मिलाते थे जो हाथ कभी हम से हँस-हँस कर,इस तम में उन्हें हाथ छुड़ाते हुए देखा है।</p>
<p dir="ltr">हमने नदियों को समुद्र से बिछड़ते हुए देखा है।अपनों को अपनों से झगडे हुए देखा है।<br>
।।4।।</p>
<p dir="ltr">वक्त की परछाई में कहा गुम है वो सितारे ,जिन्हें हमने गहन अंधकार में भी चमकते हुए देखा है।।5।।<br></p>